कभी एक मीठा लम्हा
और बन जाती है एक याद
तो कभी वोह कढ़वी बात
जो छोड़ती नही है साथ
एक गुब्बारे में जैसे बंद जिंदगी
हवा के झोंके के सहारे
बेमतलब की उड़ान
तोड़एगी काइसे वोह तारे
यादों के गुब्बारे से आगे बढ़
और ज़िन्दगी को उड़ान भरने दे
डिब्बी में बंद कर इन्हे
मेरे कदम बदने दे
कभी पेड़ भी मुरझाये फूल की याद में
फूल देना बंद करता है
या सूरज अंधेरे से डर कर
किरणों को बाँहों में समेत लेता है
यादें तो पानी की लहर है
किनारे पर जो टूट जाती
नदी फिर चल अपनी राह पर
नई लहरों को संजोती आती
मन ज़िन्दगी का पहलू है यादें
अस्तित्व मत अपना बना इन्हे
5 comments:
wow.........yado ke bare me itni achi bat bati he apne ........yade hi to jidgi banati he.....i realy like it thanks for saring with me .
vishwa
Thnx Vishwa!
Thatz a refreshing poem..Keep writing...
Thx Amit! Sorry I started blogging and then went off! I hve published a new one and hope y like it!
poet shilpi rocks !!!
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