Thursday, September 18, 2008

यादें

कभी एक मीठा लम्हा

और बन जाती है एक याद

तो कभी वोह कढ़वी बात

जो छोड़ती नही है साथ

एक गुब्बारे में जैसे बंद जिंदगी

हवा के झोंके के सहारे

बेमतलब की उड़ान

तोड़एगी काइसे वोह तारे

यादों के गुब्बारे से आगे बढ़

और ज़िन्दगी को उड़ान भरने दे

डिब्बी में बंद कर इन्हे

मेरे कदम बदने दे

कभी पेड़ भी मुरझाये फूल की याद में

फूल देना बंद करता है

या सूरज अंधेरे से डर कर

किरणों को बाँहों में समेत लेता है

यादें तो पानी की लहर है

किनारे पर जो टूट जाती

नदी फिर चल अपनी राह पर

नई लहरों को संजोती आती

मन ज़िन्दगी का पहलू है यादें

अस्तित्व मत अपना बना इन्हे

5 comments:

Unknown said...

wow.........yado ke bare me itni achi bat bati he apne ........yade hi to jidgi banati he.....i realy like it thanks for saring with me .
vishwa

Unknown said...

Thnx Vishwa!

Amit Choudhary said...

Thatz a refreshing poem..Keep writing...

Unknown said...

Thx Amit! Sorry I started blogging and then went off! I hve published a new one and hope y like it!

Anila Wadhera said...

poet shilpi rocks !!!