एक आवाज़ जो बुलंद है
एक आवाज़ तो हजारों में सुने
एक आवाज़ जो हकीकत है
जो बातों में दिखे
एक आवाज़ जो अपने हक के लिए लड़े
खड़े हो जब सीना तान कर
एक आवाज़ जो चिलाये
जिसमे लगें हो हजारों पर
एक आवाज़ जो पूछे
हजारों सवालों के जवाब
एक आवाज़ जो करदे सच
हजारों आंखों के खवाब
एक आवाज़ जो गूंजे पहाडों में
और कूदे नदी की लहरों पर
एक आवाज़ जो सुने जंगल में
भीड़ में भी हो उसका घर
क्या वो आवाज़ तुम्हारी है
जो सुन रही है अभी
खोजते हो क्यों इसे
कभी ना थी यह अजनबी
2 comments:
This one was written post the Mumbai attacks!
What a beautiful way to commemorate!
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